चुनावी मंच की चुनावी कविता by educator abhishek
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दोस्तो इस चुनावी मौसम मे कुछ चटपटी मजेदार कविता लेकर मै अभिषेक आप सबके बीच हाजिर हूँ आप लोग बहुत प्यार व आर्शीवाद देते जिससे मुझे मोटीवेशन मिलता है और कुछ नया लाने का धन्यवाद आप लोग रोज इसी तरह के हास्य कविता चुटकले हर्ट स्टोरी पढने के लिए मेरे blog पर रोज विजिट करे मै रोज नई नई स्टोरी लाता रहता हूँ मन में पकने लगे ख्याली पुलाव इधर-उधर की बातें, वही पुराने सुझाव जातियों में बंट गए लोग बांटे जा रहे दारू और नोट जो कर रहे थे भ्रष्टाचार पर चोट मयखाने में वही रहे दारू मुर्गा लूट स्वच्छ छवि की रह गयी बात अधूरी नोटों से हो गयी पेटों की भूखे पूरी ना कही समस्या ना अव्यवस्था का अब टकराव आ गया चुनाव, पकने लगे ख्याली पुलाव सभी की बन रही टोलियां लोगों की लग रही बोलियां कहीं पर फूलों की बौछार है कहीं पे रंजिश में चल रही गोलियां जनता भी तो कम नहीं नेता चुनती भ्रष्ट वही सोचती ना कभी वह क्या है गलत और क्या है सही अंधानुकरण की विकृति में है जब वह बही तो भला क्यूँ दे केवल नेताओं की लाग, की उनकी छवि है नहीं सही ऐसे ही मुद्दों पर प्यारों होता है अब टकराव आ गया चुनाव, पकने लगे ख्याली पुलाव 2.जब चुनाव आता है कितनों को बोलना कितनों को वो भी नहीं आता है जब तक चुनाव तब तक आपको जानते हैं उसके बाद माफ कीजिए हम आपको नहीं पहचानते हैं ये एक ही थाली के चटोरे है एक दूसरे के बिना अधूरे हैं राजनीति राजनीति नहीं इनके लिए तो बस खेल हैं कुछ तो ग्रेजुएट पास कुछ नौवीं फेल हैं इनका पेट बड़ा है इतना कि चारा भी खा जाते हैं पेट नहीं भरा तो फ़िर मैदान में अा जाते हैं इनकी बात का भरोसा नहीं उल्टे इनके नतीजे हैं कुर्सी मिली तो ठीक नहीं तो बुआ भतीजे हैं पागलपन की हद हैं इनकी छोटा बड़ा कद्द हैं एक जैसे ही दिखते हैं तभी तो सब गड़बड़ है लेखक :-अभिषेक अवस्थी लेखक :-educator abhishek
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