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चुनावी मंच की चुनावी कविता by educator abhishek

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4278161067010829 दोस्तो इस चुनावी मौसम मे कुछ चटपटी मजेदार कविता लेकर मै अभिषेक आप सबके बीच हाजिर हूँ आप लोग बहुत प्यार व आर्शीवाद देते जिससे मुझे मोटीवेशन मिलता है और कुछ नया लाने का धन्यवाद आप लोग रोज इसी तरह के हास्य कविता चुटकले हर्ट स्टोरी पढने के लिए मेरे blog पर रोज विजिट करे मै रोज नई नई स्टोरी लाता रहता हूँ मन में पकने लगे ख्याली पुलाव इधर-उधर की बातें, वही पुराने सुझाव जातियों में बंट गए लोग बांटे जा रहे दारू और नोट जो कर रहे थे भ्रष्टाचार पर चोट मयखाने में वही रहे दारू मुर्गा लूट स्वच्छ छवि की रह गयी बात अधूरी नोटों से हो गयी पेटों की भूखे पूरी ना कही समस्या ना अव्यवस्था का अब टकराव आ गया चुनाव, पकने लगे ख्याली पुलाव सभी की बन रही टोलियां लोगों की लग रही बोलियां कहीं पर फूलों की बौछार है कहीं पे रंजिश में चल रही गोलियां जनता भी तो कम नहीं नेता चुनती भ्रष्ट वही सोचती ना कभी वह क्या है गलत और क्या है सही अंधानुकरण की विकृति में है जब वह बही तो भला क्यूँ दे केवल नेताओं की लाग, की उनकी छवि है नहीं सही ऐसे ही मुद्दों पर प्यारों होता है अब टकराव आ गया चुनाव, पकने लगे ख्य...