शाप -एक prem कहानी by Educator Abhishek
वह जब पहली बार दुल्हन बनकर आई थी,सारे गाँव मे चर्चा आम थी, कि केसरा की बीबी का मुँह एक दम चाँद का टुकड़ा एक दम दूध सी सफेद एक दम खरा सोना और भी न जाने कितनी बातें यानि -जितने मुँह उतनी बातें
केसरा को देखकर लगता नही था कि उसे इतनी सुन्दर बीबी मिलेगी,पर - राम जाने किसको नीम पिलायी और किसको खिलाये गुलाब जामुन
कुछ तो जल भुन गये कि ऐसा भी नसीब होवे और कुछ तो ताका झांकी भी करते कि कब झाड़ू पोछा करती है और कब कपड़े धोती है और लोग यह भी सोचते की उसे देखते ही रहे उसका पति केसरा तो ठहरा भोला पता नही वह कुछ समझ भी पाता है या नही राम जाने
विवाह का महीना भर हुआ था की केसरा निकला परदेस आखिर कर्जा भी ज्यादा था कब तक घर में बैठा रहता चिंता यह भी थी की वीवी को अकेले कैसे छोड़े पर मन नही माना,सोचा की कुछ दिन मे इन्तजाम कर लेगा और उसे भी वही बुला लेगा
जेठ गुजरने को था बारिश की कोई सम्भावना नही थी हवा भी तेज चल रही थी शाम से कुछ पहले का वक्त था, सविता ने बहु को आवाज दी निर्मला जरवाजा बन्द कर दे,निर्मला ने कहा जी माँ जी/ निर्मला जरवाजा बन्द करने को ही थी कि सामने अनिल आता दिखाई दिया,उसका चेहरा गम्भीर बना हुआ था लग रहा था की कुछ अनर्थ तो नही
आह- अनर्थ ही था खबर थी कि केसरा टृक के नीचे आ गया मजदूरी हो गयी थी अपने ठिकाने को जाने ही वाला था, रास्ते मे सब खत्म हो गया, निर्मला की चूड़ियां टूट गयी/सविता जोर जोर से चिल्ला रही थी और उसका बेटा पागल की तरह मुंह बनाये जमीन पर लेटा था
दु:ख अपने केन्द पर था पर दु:ख को गाँव भूलते भूलते भूला,भूली बिसरी बात हुई पर उसके दिल मे दु:ख अभी भी ठहरा हुआ था कोई रिश्ता नही पर कुछ मानव दु:ख से भी प्यार कर लेते है,न जाने क्या था दुखयारी से बुझा अन्धेरा था मानो उसके कालेपन को हर लेगा
दो-चार दिन होते ही वह केसरा के घर पहुचता और बिना कुछ कहे वापस चला जाता न बोलना संदेह पैदा करता है निर्मला क्या सोच रही थी,आह!उसे यह नही सोचना था
पर उसे क्या पता था कि यह प्यार की शुरूआत भी हो सकती है
वह उसे देखती लगता की बरसात हो सकती है बंजर धरती पर फूल खिल सकता है बांझ गर्भवती हो सकती है वह सोचती और पाती वह प्यार कर सकती है पर जायज था , यह सब फिल्मी बातें है प्यार मे क्या जायज और क्या नाजायज! समय बढता रहा और प्यार भी

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